जंगलों पर बढ़ते हमलों से हैरान एक्सपर्ट, देश के कई राज्यों में ‘होपलो’ कीट का रहा है संकट, बनी उप समिति. रिपोर्ट- नवीन उनियाल
देहरादून: जंगलों पर कीटों (Insects) के बढ़ते हमलों से हर कोई हैरान है. देहरादून में जुटे एक्सपर्ट्स भी यह समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिरकार यह हमले बढ़ क्यों रहे हैं और इससे कैसे छुटकारा पाया जाए. हालांकि, ये समस्या केवल उत्तराखंड भर के लिए नहीं है बल्कि देश के कई राज्यों में जंगलों को होपलो (HOPLO) श्मशान बना रहा है. ईटीवी भारत की स्पेशल रिपोर्ट.
उत्तराखंड के जंगल इन दिनों एक ऐसे संकट से जूझ रहे हैं जिसने वन विभाग से लेकर वैज्ञानिकों तक की चिंता बढ़ा दी है. देहरादून के साल-SAL (Shorea Robusta) के जंगलों में तेजी से फैल रहा होपलो विनाशकारी वन कीट (Hoplocerambyx Spinicornis, आम तौर पर ‘साल हार्टवुड बोरर’ कहा जाता है) अब हजारों पेड़ों को खत्म कर चुका है. स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि विशेषज्ञ भी यह समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर इस कीट का प्रकोप लगातार क्यों बढ़ रहा है और इसे रोकने का सबसे प्रभावी तरीका क्या हो सकता है.
चपेट में राज्य के कई जंगल: हालांकि, यह संकट केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं है. देश के कई राज्यों में साल के जंगल इस कीट की चपेट में आ चुके हैं. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में भी होपलो का असर देखा गया है. लेकिन देहरादून में इसकी मौजूदा स्थिति ने वन विभाग और पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता को और बढ़ा दिया है.
हजारों पेड़ नष्ट: देहरादून जिले में इस समय 33 हजार से ज्यादा साल के पेड़ होपलो कीट की चपेट में हैं. इनमें से करीब 19 हजार पेड़ पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं. हालत यह है कि अब वन विभाग के सामने इन पेड़ों को काटने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है.
सरकार ने बनाई गठित: इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए भारत सरकार की रीजनल एंपावर्ड कमेटी ने एक उप समिति का गठन किया है. इस समिति में भारत सरकार के विशेषज्ञों के साथ-साथ फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी एफआरआई के वैज्ञानिक और वन विभाग के अधिकारी शामिल हैं. समिति ने देहरादून के प्रभावित जंगलों का दौरा कर अध्ययन किया और जो तथ्य सामने आए उन्होंने विशेषज्ञों को भी हैरान कर दिया.
तेजी से बढ़ रहा होपलो का हमला: सर्वे के दौरान यह साफ हुआ कि होपलो कीट के हमले लगातार बढ़ते जा रहे हैं. सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि अब यह कीट उन क्षेत्रों तक भी पहुंच चुका है, जहां पहले कभी इसका प्रभाव नहीं देखा गया था.
तेजी से बढ़ी संख्या: अगर पिछले कुछ सालों के आंकड़ों को देखें तो, समस्या की गंभीरता का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है.
- साल 2023 में करीब 500 साल के पेड़ इस कीट से प्रभावित हुए थे.
- साल 2024 में यह संख्या बढ़कर 1500 तक पहुंच गई.
- साल 2025 में लगभग 7000 पेड़ इसकी चपेट में आए.
- जबकि साल 2026 में यह आंकड़ा सीधे 33 हजार से अधिक हो गया.
- ये आंकड़ा सिर्फ उत्तराखंड के देहरादून डिवीजन का है. इसके अलावा प्रदेश के जंगलों में होपलो कीट का असर नहीं देखा गया है. देहरादून में भी मसूरी, कालसी और देहरादून रेंज में होपलो का हमला है.
- हालांकि, पूर्व में होपलो का असर कालसी और मसूरी रेंज के कुछ ही क्षेत्रों में देखा गया था, लेकिन अब पूरे रीजन में देखा जा रहा है.
विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी तेजी से बढ़ती संख्या इस बात का संकेत है कि जंगलों में होपलो को लेकर स्थिति बिगड़ रही है. नमी वाले क्षेत्रों में इसका असर ज्यादा देखा जा रहा है और जलवायु परिवर्तन भी इसकी एक बड़ी वजह माना जा रहा है.
पुरानी विधियां पड़ रही हैं नाकाफी: वन विभाग वर्षों से होपलो कीट को नियंत्रित करने के लिए ट्री ट्रैप विधि का इस्तेमाल करता रहा है. इस तकनीक में जंगल में कुछ हरे साल के पेड़ों को काटकर छोड़ दिया जाता है, ताकि कीट उन पेड़ों की ओर आकर्षित हों. इसके बाद विशेषज्ञ उन पेड़ों से कीट निकालकर केरोसिन की मदद से नष्ट कर देते हैं.
लेकिन मौजूदा सर्वे के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि यह विधि अब पर्याप्त नहीं रह गई है. कीटों की संख्या इतनी तेजी से बढ़ रही है कि पारंपरिक तरीके उन्हें नियंत्रित करने में सफल नहीं हो पा रहे.
यही वजह है कि अब उप समिति नए उपायों पर विचार कर रही है. प्रभावित जंगलों के अध्ययन के बाद समिति ने कई सुझाव तैयार किए हैं, जिनमें शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म दोनों तरह की रणनीतियां शामिल हैं.
क्या है होपलो कीट: - होपलो एक ऐसा कीट है जो केवल साल के पेड़ों को निशाना बनाता है.
- यह अपने अलग-अलग जीवन चरणों में पेड़ों को नुकसान पहुंचाता है और आखिरकार उन्हें पूरी तरह खत्म कर देता है.
- इस कीट का जीवन चक्र लगभग एक साल का होता है.
- बरसात के बाद यह अंडे देता है.
- करीब तीन महीने बाद अंडों से लार्वा निकलता है.
- इसके बाद यह प्यूपा अवस्था में पहुंचता है और जंगलों को तेजी से नुकसान पहुंचाना शुरू कर देता है.
- एडल्ट अवस्था में पहुंचने के बाद यह लाखों अंडे देकर अपनी संख्या तेजी से बढ़ा लेता है.
यही कारण है कि एक बार यदि किसी जंगल में इसका प्रकोप बढ़ जाए तो उसे नियंत्रित करना बेहद मुश्किल हो जाता है.
लगातार बढ़ रही पकड़े गए कीटों की संख्या: वन विभाग लगातार होपलो कीटों को पकड़कर नष्ट भी कर रहा है. इसके बावजूद समस्या कम नहीं हो रही. आंकड़ों के अनुसार, साल 2023 में 11 हजार 372 होपलो कीट पकड़े गए थे. 2024 में यह संख्या बढ़कर 24 हजार 967 हो गई. वहीं 2025 में वन विभाग ने 1 लाख 20 हजार 143 कीटों को पकड़कर नष्ट किया. इसके बावजूद जंगलों पर इनका असर कम नहीं हुआ, बल्कि और तेजी से बढ़ता गया. इससे साफ है कि मौजूदा उपाय पर्याप्त साबित नहीं हो रहे हैं.
पेड़ों की बनाई गई सात कैटेगरी: उप समिति ने प्रभावित पेड़ों को उनकी स्थिति के आधार पर सात कैटेगरी में बांटा है.
सबसे ज्यादा प्रभावित कैटेगरी 1 और 2 में आने वाले पेड़ों की संख्या 19 हजार 106 बताई गई है. विशेषज्ञों का मानना है कि इन पेड़ों को बचाया नहीं जा सकता, इसलिए इन्हें काटना ही एकमात्र विकल्प है.
कैटेगरी 3 में 4 हजार 249 पेड़ शामिल हैं. समिति का सुझाव है कि इन पेड़ों को भी काट दिया जाए, ताकि संक्रमण दूसरे पेड़ों तक न फैले. इसके अलावा कैटेगरी 4 और 5 में लगभग 4 हजार 800 पेड़ हैं, जिनकी निगरानी की जाएगी. अगले एक साल तक इनकी स्थिति का अध्ययन करने के बाद ही अंतिम फैसला लिया जाएगा.
नए प्रयोगों पर भी हो रहा विचार: फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (एफआरआई) ने इस पूरे मामले पर विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन करने का फैसला लिया है. इसके तहत यह समझने की कोशिश होगी कि आखिर होपलो का प्रकोप अचानक इतना ज्यादा क्यों बढ़ रहा है.
इसके अलावा, एक और महत्वपूर्ण विचार सामने आया है. वैज्ञानिक अब ऐसे दूसरे कीटों को जंगलों में छोड़ने की संभावना पर विचार कर रहे हैं जो होपलो को खाकर उसकी संख्या नियंत्रित कर सकें. हालांकि, इससे पहले एफआरआई में इसका ट्रायल किया जाएगा. इसके बाद ही रीजनल एंपावर्ड कमेटी अंतिम निर्णय लेगी.
नमी वाले जंगल ज्यादा प्रभावित: विशेषज्ञों के मुताबिक, होपलो का असर उन जंगलों में ज्यादा होता है जहां नमी अधिक रहती है. नमी की वजह से कीटों के अंडों और लार्वा के विकसित होने की प्रक्रिया तेज हो जाती है.
इसके अलावा जंगलों में वैज्ञानिक प्रबंधन की कमी भी एक बड़ी वजह मानी जा रही है. वन विशेषज्ञ एसके सिंह का कहना है कि,
लंबे समय से जंगलों में वैज्ञानिक तरीके से काम नहीं हुआ, जिसके कारण समस्या लगातार बढ़ती चली गई.
– एसके सिंह, वन विशेषज्ञ –क्या होना चाहिए समाधान: वन विशेषज्ञ एसके सिंह के मुताबिक इस संकट से निपटने के लिए शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म दोनों तरह की योजना जरूरी है.
लॉन्ग टर्म प्लान के तहत ANR यानी सहायतित प्राकृतिक पुनरूत्पादन प्रबंधन (Assisted Natural Regeneration Management) पर काम करना होगा. इसमें पुराने और कमजोर साल के पेड़ों की जगह नए पेड़ों को विकसित किया जाता है. साथ ही जंगलों में दूसरी सहयोगी प्रजातियों को भी बढ़ावा दिया जाता है ताकि जैव विविधता बनी रहे.
वहीं शॉर्ट टर्म प्लान में ट्री ट्रैप गतिविधियों को सही समय पर करना बेहद जरूरी है. इसके अलावा प्रभावित पेड़ों को समय पर काटना और साल में दो से तीन बार केमिकल स्प्रे करना भी जरूरी माना गया है.
– एसके सिंह, वन विशेषज्ञ –विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते व्यापक रणनीति नहीं बनाई गई तो आने वाले सालों में साल के जंगलों पर इसका असर और विनाशकारी हो सकता है.
रीजनल एंपावर्ड कमेटी को उप समिति अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपने की तैयारी कर रही है. भारत सरकार के विशेषज्ञों, एफआरआई के वैज्ञानिकों और वन विभाग के अधिकारियों के सुझावों को मिलाकर एक संयुक्त खाका तैयार किया जा रहा है.
– नीरज शर्मा डीएफओ, देहरादून –पहले भी आ चुका है बड़ा संकट: होपलो का संकट नया नहीं है. मध्य प्रदेश में साल 1980 के दौरान करीब 30 लाख साल के पेड़ इस कीट की चपेट में आए थे. वहीं देहरादून डिवीजन के थानों रेंज में भी 1995 में लगभग एक लाख पेड़ प्रभावित हुए थे. देहरादून की थानों रेंज में तब होपलो का ऐसा ही हमला हुआ था. अब करीब 31 साल बाद उत्तराखंड में इस कीट का दोबारा बड़े पैमाने पर सक्रिय होना कई सवाल खड़े करता है.
हालांकि, वन विभाग का मानना है कि, इन 31 सालों के बीच में इसका असर काफी कम दिखाई दिया, जो कि एक अध्ययन का विषय है. लेकिन अभी तक के अध्ययन में सामने आया है कि जिस साल जलवायु परिवर्तन का असर ज्यादा हुआ है, बारिश ज्यादा हुई है जिससे जंगलों में नमी बढ़ी है, उस दौरान कीट का संख्या में भी भारी इजाफा हुआ है. वहीं, जिस साल गर्मी अधिक पड़ी और धूप अधिक रही और मौसम शुष्क रहा, उस दौरान इन कीटों की संख्या में कमी दर्ज की गई. लेकिन ये भी साफ है प्रभावित रेंज से होपलो कीट कभी पूरी तरह से नष्ट नहीं हुए.
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और स्थानीय पारिस्थितिकी में बदलाव इसके पीछे प्रमुख कारण हो सकते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि इतिहास बताता है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो यह संकट और गंभीर रूप ले सकता है.